UP: गांव में बना English Devi का मंदिर, जानें क्यों और कैसे हुआ निर्माण


लखनऊ: आजकल के जमाने में अंग्रेजी (English Language) भाषा का ज्ञान और बोलना (English Speaking ) बेहद जरूरी है. मॉडर्न जमाने में आज भी कई लोग हैं जो अंग्रेजी बोलने में हिचकिचाते है वहीं कुछ ऐसे भी है जिन्हे अंग्रेजी बोली नहीं आती. लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में एक ऐसी भी जगह है जहां पढ़े-लिखे हों या अनपढ़ कोई भी जाए और ईमानदारी से प्रयास करे तो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना सीख सकता है. 

नेक मकसद से निर्माण

लखीमपुर खीरी (Lakhimpur Kheri) जिले के बनका के एक स्कूल में स्थापित ये मंदिर और मूर्ति दिखने में भी बड़ी विचित्र है. मंदिर के निर्माण की कहानी भी दिलचस्प है. इसके निर्माण के बाद सामान्य जनमानस का ध्यान अंग्रेजी भाषा सीखने की ओर गया. स्थानीय लोगों की मानें तो मंदिर में लोग ये मन्‍नत लेकर आते हैं कि उनके बच्‍चों का एडमिशन सबसे अच्‍छे इंग्लिश स्‍कूल में हो जाए और उनके बच्‍चे भी इंग्लिश में महारथ हासिल करें, इसी आस लिए लोग यहां आते हैं. 

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मंदिर निर्माण की कहानी

यहां के स्थानीय लोगों का ये भी मानना है कि शिक्षा के हिसाब से आज दलित पुरुषों के पास काफी विकल्प है. एचटी में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक क्षेत्र की महिलाओं की स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस मंदिर के निर्माण का आइडिया आया. एक प्राइवेट संस्थान ने इस मंदिर का निर्माण कराया ताकि लोग प्रेरित हों और अंग्रेजी से डरकर भागने की बजाये उसे सीखने में दिलचस्पी लें. वहीं गांव वालों को जब इसका पता चला तो उन्होंने तहे दिल से फैसले का स्वागत किया.

मंदिर निर्माण के समय स्थानीय लोगों ने सोंचा कि महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र में ज्यादा ही पिछड़ी हैं, ऐसे में अगर इंग्लिश देवी के मंदिर में जब वो मत्था टेकने जाएंगी तो इंग्लिश देवी उनमें शिक्षा खास तौर से इंग्लिश भाषा का संचार करेंगी और वो इंग्लिश सीख जाएंगी. 

दलित आबादी पर फोकस

अपने पति के साथ मिलकर नालंदा पब्लिक शिक्षा निकेतन और एक इंटर कॉलेज चलाने वाली निशा पॉल जौहर ने कहा, ‘धर्म लोगों को बांधता है हमने सोंचा कि अगर लोग अंग्रेजी सीखने के लिए धार्मिक रूप से जुड़े हैं, तो यह उनके लिए और भी फायदेमंद साबित होगा. मंदिर निर्माण से जुड़े लोगों ने कहा कि देश की दलित आबादी आज भी बड़े पैमाने पर अशिक्षित या अशिक्षित हैं. इसी वजह से मंदिर के निर्माण का आइडिया आया. और दलित विद्वान और विचारक चंद्रभान प्रसाद की प्रेरणा से ये काम पूरा हुआ.’

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