DNA ANALYSIS: चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे, जश्न में शामिल हुए लेफ्ट फ्रंट और DMK के नेता


नई दिल्ली: ये बात हम सब जानते हैं कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. जबकि दुश्मन का दोस्त भी दुश्मन होता है और आप अपने दुश्मन को घर बुलाना तो दूर.. उसे अपने घर के आस पास भटकने भी नहीं देना चाहेंगे. लेकिन भारत एक ऐसा देश है, जहां कुछ लोग राजनीति और विचारधारा की खातिर देश के शत्रुओं को अपना मित्र बना लेते हैं और उनके जश्न में शामिल हो जाते हैं. आज हम कुछ ऐसे ही लोगों का पर्दाफाश करेंगे जिनके लिए देशभक्ति से बड़ी दुश्मन की विचारधारा है.

चीन के जश्न में मग्न भारत के वामपंथी

आप कह सकते हैं कि एक तरफ तो बॉर्डर पर चीन से युद्ध की तैयारी हो रही है और दूसरी तरफ देश के ही कुछ लोगों की चीन के साथ पार्टी हो रही है. मंगलवार को भारत में चीन के दूतावास ने कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के मौके पर एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का आयोजन किया. जिसकी मेजबानी खुद भारत में चीन के राजदूत ने की. लेकिन इसकी बाकी की गेस्ट लिस्ट अगर आप देखेंगे तो हैरान रह जाएंगे.

इस ऑनलाइन सेमिनार के भारतीय मेहमान थे. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (Marxist) यानी CPIM के महासचिव सीताराम येचुरी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के महासचिव डी राजा, DMK के सांसद एस सेंथिल कुमार और ऑल इंडिया फॉर्वर्ड ब्लॉक के के सबसे बड़े नेता जी देवराजन. 

इस सेमिनार का थीम था- Sharing Experience on Party-Building, Promoting Exchanges and Cooperation यानी पार्टी बनाने के अनुभवों को बांटना और विचारधारा के आदान प्रदान को आगे बढ़ाना. इससे आप अंदाजा लगाइए कि ये तमाम नेता इस सेमिनार में हिस्सा लेने क्यों गए थे. ये लोग चीन से उसके अनुभवों और विचारों को समझना चाहते थे.

चीन के राजदूत ने भी इस मौके का पूरा फायदा उठाया और अपनी स्पीच के दौरान लद्दाख और गलवान पर अपने देश का पक्ष रखा और कहा कि पूरी दुनिया को पता है कि वहां किसने सही किया और किसने गलत.

अब आप सोचिए इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले नेता हमारे ही देश के नागरिक हैं. इन नेताओं को इस समय भारत के साथ खड़े होना चाहिए, लेकिन ये लोग लद्दाख पर चुपचाप चीन के राजदूत का लेक्चर सुन रहे थे. हैरानी की बात ये है कि बात बात पर ट्वीट करने वाले इन नेताओं ने इस मीटिंग की जानकारी किसी तो नहीं दी लेकिन जब पोल खुल गई तो कहने लगे कि इसमें गलत क्या है.

ऐसे खुली वामपंथियों की पोल

चीन के दूतावास ने अपनी वेबसाइट पर इस कार्यक्रम की जानकारी देते हुए लिखा है कि इन नेताओं ने न सिर्फ 100 साल पूरे होने पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को बधाई दी. बल्कि चीन की सरकार की उपलब्धियों की तारीफ भी की और कहा कि चीन में नागरिकों के हितों का ध्यान रखने वाली सरकार है.

आखिर चीन की उपलब्धि क्या है? 

लेकिन इन लोगों ने चीन के राजदूत से ये नहीं पूछा कि वो कौन सी उपलब्धियों की बात कर रहे हैं. क्या Hong Kong की आजादी छीनना उपलब्धि है, क्या तिब्बत का दमन चीन की उपलब्धि है, ताईवान को युद्ध की धमकियां देना उपलब्धि है, या फिर वीगर मुसलमानों का नरसंहार चीन की उपलब्धि है. ये सवाल पूछने की बजाय ये लोग चुपचाप चीन का सरकारी भाषण सुनते रहे.

ये लोग इसलिए कुछ नहीं बोल पाए क्योंकि हमारे यहां कभी इस पर एक राय नहीं बन पाती कि देश का दुश्मन कौन है और देश का दोस्त कौन है? भारत ने पाकिस्तान के साथ 1965, 1971 और 1999 में युद्ध लड़ा, लेकिन उस समय भी भारत एक नहीं हो पाया और भारत के ही बहुत सारे लोग पाकिस्तान के बचाव में लगे रहे. या उससे संबंध सुधारने की वकालत करते रहे. आज भी भारत के बहुत सारे बुद्धिजीवी, फिल्म स्टार्स और पत्रकार पाकिस्तान जाने के लिए बेताब रहते हैं और ये लोग पाकिस्तान से लौटकर कहते हैं कि इन्हें वहां बहुत प्यार मिला.

दुश्मनों को लेकर भारत एकमत नहीं

इसी तरह चीन के मसले पर भी भारत कभी एक नहीं हो पाया. भारत की सेना आज भी बॉर्डर पर चीन की सेना के सामने तैनात है. भारत सरकार चीन के मोबाइल ऐप्स पर बैन लगा चुकी है, चीन की कई कंपनियों को भारत आने से मना कर चुकी है. भारत के प्रधानमंत्री ने चीन के राष्ट्रपति को जन्मदिन की बधाई नहीं दी. भारत सरकार ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को 100 वर्ष पूरे होने पर बधाई नहीं दी. लेकिन भारत के वामपंथी चीन के जश्न में मगन हैं. यानी इन लोगों ने देश के दुश्मन को अपना दोस्त मान लिया है. तो फिर आप सोचिए कि अब इन्हें क्या माना जाए. क्योंकि दुश्मन का दोस्त तो दुश्मन ही होता है. कुल मिलाकर बात साफ है कि भारत के दुश्मन सीमाओं के उस पार ही नहीं बल्कि भारत की सीमाओं के अंदर भी बैठे हैं.

हालांकि इस सेमिनार के बाद CPI के नेता D Raja ने कहा कि इसमें कुछ गलत नहीं था क्योंकि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के 100 वर्ष पूरे होना एक बड़ा अवसर है और वो अपनी शुभकामनाएं देने के लिए इस कार्यक्रम में शामिल हुए थे.

देश के खिलाफ वामपंथियों की विचारधारा

ये विडंबना है कि जो विचारधारा देश के साथ नहीं है उस विचारधारा को मानने वाले नेता चुनाव भी जीत जाते हैं. जनता इन्हें वोट भी दे देती है और ये लोग संसद और विधानसभाओं में भी पहुंच जाते हैं.

केरल में आज भी वामपंथी सरकार है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज भी लेफ्ट का प्रभाव है. त्रिपुरा जैसे राज्यों में वर्षों तक लेफ्ट की सरकार रही और तमिलनाडु में इस समय जो सरकार है उसकी विचारधारा के केंद्र में भी वामपंथ है.

यही वजह है कि जब बॉर्डर पर भारत और चीन के सैनिक टकराते हैं तो ये लोग कभी भी खुलकर चीन का विरोध नहीं करते. बल्कि भारत की सेना और सरकार से ही सवाल पूछने लगते हैं. लेकिन देश के खिलाफ जाना और देश के दुश्मनों का साथ देना वामपंथियों की पुरानी आदत है.

देश विरोधी कम्युनिज्म की क्रोनोलॉजी

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना वर्ष 1920 में उज्बेकिस्तान के ताशकंद में हुई थी. तब उज्बेकिस्तान सोवियत संघ का हिस्सा था, जहां कम्युनिस्ट शासन था और इसीलिए इन लोगों ने भारत के बाहर जाकर सोविय संघ की सहायता से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की.

इसके बाद इनका असली चेहरा वर्ष 1942 में दिखा जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत छोड़ो आंदोलन को समर्थन देने से मना कर दिया. तर्क ये था कि उस समय ब्रिटेन और सोवियत संघ मिलकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर की सेनाओं से लड़ रहे थे.

इसलिए उस समय वामपंथियों का मानना था कि ब्रिटेन की ताकत को कमजोर नहीं करना चाहिए, फिर भले ही भारत वर्षों तक अंग्रेजों का गुलाम ही क्यों ना बना रहे.

इसी दौरान जब नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने इंडियन नेशनल आर्मी (Indian National Army) की स्थापना की तो इसी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने मुख पत्र People’s War में नेताजी के लिए अपशब्द लिखे. उन्हें साम्राज्यवादी ताकतों का मोहरा बताया. खैर वामपंथियों की साजिशों के बावजूद भारत आजाद हो गया. लेकिन आजादी के बाद भी इन लोगों ने अपने देश का साथ नहीं दिया.

वर्ष 1959 में जब भारत की तत्कालीन सरकार ने इस बात का खुलासा किया, कि लद्दाख के आस पास चीन भारत की जमीन पर अतिक्रमण कर रहा है तो चीन का विरोध करने की बजाय वामपंथियों ने बिल्कुल चुप्पी साध ली थी और यहां तक कि उस दौरान वापमंथी पार्टियों ने कुछ ऐसे बयान भी जारी किए, जो चीन के तो हित में थे लेकिन भारत की संप्रभुता के लिए खतरा थे.

यहां तक कि 60 वर्ष पहले जब चीन की सेना ने तिब्बत पर जबरदस्ती कब्जा किया तब भी वामपंथियों ने चीन का साथ दिया और कहा कि चीन तिब्बत के लोगों को अंधकार से बाहर निकालने का काम कर रहा है. इतना ही नहीं Communist Party Of India ने तो ये तक कह दिया था कि तिब्बत में जो लोग चीन का विरोध कर रहे हैं वो सामंती विचारधारा के हैं और इनमें दलाई लामा भी शामिल हैं.

यहां तक भी ठीक था लेकिन जब वर्ष 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया तब भी कई वामपंथी नेताओं ने भारत की जगह चीन का साथ दिया. यहां तक कि जो वामपंथी भारत के सैनिकों के लिए खून देना चाहते थे या पैसों से भारतीय सेना की मदद करना चाहते थे उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया. 

जब कुछ बड़े वामपंथी नेताओं ने इसका विरोध किया तो पार्टी में उनका पद घटाकर उन्हें सजा दी गई. इतना ही नहीं उस समय कई वामपंथी नेता चीन के समर्थन में रैलियां तक कर रहे थे.

1962 के युद्ध में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI चीन का इस तरह से समर्थन कर रही थी, कि तत्कालीन सरकार को इस पार्टी के कुछ नेताओं को जेल भेजना पड़ा था. इस युद्ध के बाद CPI टूट गई और CPI M का गठन हुआ.

CPIM का गठन बीजिंग के निर्देश पर हुआ?

The Red Rebel In India नामक एक पुस्तक में इस बात का जिक्र है कि 1 जनवरी 1965 को भारत के तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी नंदा ने एक रेडियो कार्यक्रम में कहा था कि CPIM का गठन बीजिंग के निर्देश पर हुआ है. ताकि देश में अस्थिरता पैदा की जा सके और एशिया पर चीन का प्रभुत्व स्थापित किया जा सके.

ध्यान देने वाली बात है कि वर्ष 1965 में जनवरी के महीने में ही भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की आहट सुनाई देने लगी थी. लेकिन इन सबके बीच भी भारत के वामपंथी भारत के दुश्मन का साथ देने की तैयारी कर रहे थे.

CPIM ये दावा करती थी कि वो CPI से ज्यादा वापमंथी है. लेकिन CPI M के गठन के तीन साल बाद ही CPIM टूट गई और चारू मजूमदार ने CPIML का गठन किया. अगर आप इसके पीछे का तर्क सुनेंगे तो आप हैरान रह जाएंगे, तर्क ये था कि CPIM भी उतनी वामपंथी नहीं है जितनी होनी चाहिए. चारू मजूमदार चाहते थे कि पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में माओ त्से तुंग के Long March की तर्ज पर एक आंदोलन शुरू किया जाए. माओ त्से तुंग के नेतृत्व में 1934 से 1936 के बीच Long March आंदोलन के दौरान चीन के कई जमीदारों की निर्मम हत्या कर दी गई थी. और ऐसा ही खून खराबा चारू मजूमदार भारत में देखना चाहते थे.

इसके बाद भारत में नक्सल आंदोलन की शुरुआत हुई और दशकों तक हजारों लाखों लोगों का खून बहता रहा और आज भी बह रहा है. 

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बासु ने अपनी पुस्तक A Political Autobiography में लिखा है कि चारू मजूमदार और उनके समर्थकों ने उनसे कहा था कि हम माओ के अनुयायी हैं और चीन का चेयरमैन ही हमारा चेयरमैन है.

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना माओ त्से तुंग ने की थी और वही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन थे.

वर्ष 1970 में पश्चिम बंगाल की दीवारों पर माओ त्से तुंग के पोस्टर्स लगाए जाते थे जिनमें यही बात लिखी होती थी कि चीन का चेयरमैन ही हमारा चैयरमैन है. 

भारत के खिलाफ चीन का समर्थन करती है CPIM

वर्ष 2017 में जब डोकलाम में भारत और चीन के बीच विवाद हुआ था तब CPIM ने खुलकर चीन का समर्थन किया था और अपने मुखपत्र में लिखा था कि इसके लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत की अमेरिका से नजदीकी जिम्मेदार है. इसमें ये भी लिखा गया था कि भारत दलाई लामा को जो समर्थन दे रहा है उससे चीन गुस्से में है. इसी मुखपत्र में ये भी लिखा था कि भारत को भूटान के मामलों में दखल अंदाजी नहीं करनी चाहिए और भूटान को चीन के साथ अपनी सीमा का विवाद खुद सुलझाने देना चाहिए.

चीनी कार्यक्रम में शामिल होने पर क्या बोले ये नेता? 

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले वामपंथी नेताओं का कहना है कि इसमें कुछ गलत नहीं है क्योंकि दूसरी पार्टियों के नेता भी अक्सर ऐसा करते हैं. इन नेताओं का ये भी तर्क है कि वो तो भारत और चीन के बीच जमी बर्फ को पिघलाने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन अब हम इन्हें अमेरिका की एक आइसक्रीम बनाने वाली कंपनी का उदाहरण देना चाहते हैं..जिससे ये स्पष्ट हो जाएगा कि जब बात देश की आती है तो आपको क्या करना चाहिए.

आइस्क्रीम बनाने वाली कंपनी से लें देशभक्ति की सीख

अमेरिका का एक मशहूर आइसक्रीम ब्रांड है जिसका नाम है Ben & Jerry’s. कुछ दिनों पहले इस कंपनी ने फैसला लिया कि वो वर्ष 2023 की शुरुआत से फिलीस्तीन के उन इलाकों में अपनी आइसक्रीम नहीं बेचेगी जहां अब इजरायल के लोग रहते हैं. इस कंपनी का कहना है कि इजरायल ने इन इलाकों पर जबरदस्ती कब्जा किया हुआ है.

इसके बाद इजरायल की सरकार और वहां के लोगों ने इजरायल तो क्या पूरी दुनिया में इस आइस्क्रीम का बहिष्कार करने का फैसला ले लिया. इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका में इजरायल के राजदूत ने अमेरिका के उन 35 राज्यों के गवर्नरों को एक 35 पन्नों का लेटर लिखा जहां इजरायल के बहिष्कार के खिलाफ कानून बनाए गए हैं.

यानी इजरायल और वहां के लोग उनके देश का विरोध करने वाली एक कंपनी के खिलाफ एक साथ खड़े हो गए. लेकिन क्या आप इसकी कल्पना भारत में कर सकते हैं? कल अगर यही कंपनी ये कह दे कि वो ये मानती है कि भारत ने कश्मीर पर जबरदस्ती कब्जा किया हुआ और ये कश्मीर में अपनी आईसक्रीम नहीं बेचेगी तो क्या भारत के लोग और भारत के नेता एक साथ खड़े होकर इसका विरोध करेंगे.

हमें लगता नहीं है कि ऐसा होगा बल्कि कुछ लोग तो शायद ये आइसक्रीम खाने के लिए बेताब हो उठेंगे और शायद इस कंपनी को ही सही बताने लगेंगे. बस यही फर्क भारत को एक देश के तौर पर कमजोर करता है और इसी वजह से भारत के दुश्मन के दोस्त देश के अंदर बैठकर ही देश को खोखला करते हैं. कोई भी देश सीमा पार बैठे दुश्मन से तो लड़ सकता है लेकिन अपनी ही सीमा में बैठे दुश्मनों से लड़ना बहुत मुश्किल होता है और इस समय भारत के सामने ये दोनों चुनौतियां हैं. यानी देश की सीमा के बाहर भी दुश्मन हैं और सीमा के अंदर भी.



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