Happy Father’s Day: ये पांच ‘Money Mantra’ बदल देंगे आपके बच्चों की जिंदगी, बचपन से ही डालें ये आदतें


नई दिल्ली: Happy Father’s Day: हर पिता की ख्वाहिश होती है कि उसकी संतान कामयाबी की हर ऊंचाई की छुए, वो अपनी जिंदगी में जो बनना चाहता है बने. लेकिन इस सपने को पूरा करने में पिता को पैसों के साथ साथ अपनी संतान को पैसों से जुड़े कुछ पहलुओं को भी खर्च करना चाहिए. पैसा कमाना आसान है, आप कोई भी काम करके पैसा कमा सकते हैं, लेकिन पैसा बचाना, ये सबसे बड़ी चुनौती होती है. आप अपनी संतान को पैसों की सवारी करना सिखाएं, न कि पैसे की गुलामी करना. उसमें वो आदत पैदा करें कि वो पैसे तो खूब कमाए लेकिन जिंदगी भर सिर्फ पैसा कमाने के बारे में ही न सोचे.

Father’s Day पर हम आपको कुछ ऐसे मंत्र देंगे जो अगर आप अपने बेटे या बेटी को देंगे तो ये पैसे को लेकर उनका नजरिया बदल सकता है. ये कोई भारी भरकम फाइनेंशियल प्लानिंग नहीं, बल्कि रोजाना की जिंदगी में होने वाली चीजें हैं, लेकिन इसका इम्पैक्ट आपके बच्चों की जिंदगी पर बहुत गहरा पड़ेगा.

1. Needs और wants में अंतर

कोई भी पिता अपनी संतान को ‘न’ नहीं बोलना चाहता. इसलिए उसकी हर मांग को पूरा करता है, हर चीज खरीदकर देता है, बिना सोचे की इसकी जरूरत है भी या नहीं. जैसे- महंगे फोन, आईपैड, महंगी घड़ी, वीडियो गेम्स वगैरह. लेकिन कभी जब पिता के तौर पर आपको लगता है कि आपकी संतान जो मांग रही है, उसकी शायद जरूरत नहीं है. तो आप उसे कई तरह के बहाने करके टालने की कोशिश करते हैं, जैसे- बाद में दिला दूंगा, बहुत महंगा है या कोई भी दूसरा चलता-फिरता बहाना. बस यहीं पर आप एक मौका गंवा देते हैं अपने बच्चे को जरूरत और चाहत (Needs and Wants) के बीच अंतर को समझाने का. आपको टालने की बजाय उसे ये समझाने की कोशिश करनी चाहिए कि क्या जो चीज मांगी जा रही है, उसकी जरूरत है भी या नहीं. ये प्रैक्टिस आपको हर बात, हर डिमांड हर चीज के लिए करनी है. ये फैसला उसको करने दें कि क्या वो जो मांग रहा है, वाकई उसकी जरूरत है भी या नहीं. धीरे-धीरे ये उसकी सोचने की प्रक्रिया में शामिल हो जाएगा, वो हर चीज को, हर फैसले को जरूरी और गैर-जरूरी के तराजू पर तौलकर देखेगा और फिर तय करेगा कि उसको क्या करना है.

2. पैसे कमाना जरूरी है, लेकिन बचाना उससे भी जरूरी

आपको अपनी संतान को ये सीख देनी होगी कि Earning Is Important But, Saving Is Mandatory. बच्चों में पैसे बचाने की आदत बचपन से ही डालनी चाहिए. एक छोटे से गुल्लक में रोजाना उसको कुछ पैसे डालने चाहिए. ये सेविंग की पहली सीढ़ी है. सेविंग को लेकर उसका दिमाग वैसे ही चलना चाहिए, जैसे भूख, प्यास और नींद. यानी इसके बिना जिंदगी नहीं चल सकती. और उसे इस सांचे में ढालने की जिम्मेदारी पिता की होती है. आप उसे पॉकेट मनी दें, लेकिन एक सेविंग टारगेट के साथ. उसे अगर आप रोजाना 100 रुपये पॉकेट मनी देते हैं, तो उसे ये लक्ष्य दें कि अगर वो हर महीने 900 रुपये अपने गुल्लक में जमा करेगा तो उसकी पॉकेट मनी अगले महीने से हर बार 5 रुपये बढ़ जाएगी. यानी आपने उसे ये सिखाया कि उसे 100 रुपये में से पहले 30 रुपये गुल्लक में डालने होंगे, बाकी के 70 रुपये वो खर्च कर सकता है. ये सेविंग का बेसिक फॉर्मूला है. इसकी आदत चमत्कार कर सकती है.

3. लालच बुरी बला है

पैसा खर्च करने लिए होता है, उससे हम अपनी जरूरत की चीजें खरीदते हैं. लेकिन ये एक ऐसा घोड़ा जिसके हाथ में जाता है, छूटने की कोशिश करता है. इसलिए इस घोड़े की सवारी करना बच्चों को बचपने से ही सिखाएं. कई रिसर्च में ये सामने आया है कि जब हम सुपरमार्केट्स, मॉल में शॉपिंग करने जाते हैं तो हम अपनी जरूरत से ज्यादा सामान खरीदकर घर आते हैं. अगली बार जब आप शॉपिंग करने जाएं तो अपने बेटे को लिस्ट थमाकर शॉपिंग की चीजें लाने को कहें, ये पक्का मानकर चलिए कि लिस्ट के बाहर की कई चीजें लेकर आएगा. तब आप लिस्ट से उसके सामने ही मिलान करें, और उससे पूछें कि उसने लिस्ट से बाहर की चीजें क्यो खरीदीं. तो जवाब मिलेगा कि उसपर 50 परसेंट डिस्काउंट था या कोई ऑफर रहा होगा या कुछ और भी.
इसका मतलब ये हुआ कि जो सामान लिस्ट से बाहर खरीदे गए हैं वो जरूरत के नहीं बल्कि लालच की वजह से खरीदे गए हैं. बच्चे को इस बात को समझाएं और लिस्ट के बाहर सभी आइटम्स को वापस रखने को कहें. आप देखेंगे कि एक-दो बार की प्रैक्टिस के बाद वो लिस्ट से बाहर कोई चीज नहीं खरीदेगा.

4. बच्चे जो देखते हैं वो ही सीखते हैं  

एक सिद्ध तथ्य है कि बच्चे जो देखते हैं, वो ही सीखते हैं. ऐसे में पिता के तौर पर आपकी जिम्मेदारी बड़ी हो जाती है. पैसों के बारे में आपका बेटा या बेटी वहीं सीखेंगे जैसा आपको करता हुआ वो देखेंगे, इसलिए सबसे पहले आपको पैसों को लेकर नजरिया बदलना होगा. कोई भी चीज घर लाते हुए आपको पहले इस सवाल का जवाब खोजकर रखना होगा कि वो घर जाकर बच्चों को क्या बोलेंगे. वो क्यों इसे लेकर आए, क्या इसकी जरूरत थी. क्योंकि अगली बार जब आप उन्हें कोई ऐसी चीज को खरीदने के लिए मना करेंगे जो जरूरी नहीं है तो आपके बच्चे उसे मानेंगे कि नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है. इसलिए गांधी जी का तो किस्सा आपने सुना होगा, पहले खुद गुड़ खाना छोड़ना सीखना होगा, उसके बाद दूसरे को मना करिए.

5. पैसा कमाने की आदत

क्या आपके बच्चों को पता है कि आप कितनी मेहनत करके पैसे कमाते हैं, शायद नहीं. तो उनको ये समझाइए, उन्हें बताना होगा कि पैसे कमाने पड़ते हैं. इसके लिए आपको थोड़ा प्रैक्टिकल होना होगा. आप बच्चे को कोई भी घरेलू काम दें और उसके ऐवज में उसे पैसे दें. जैसे- अगर वो अपने कमरे की सफाई करेगा तो उसे पैसे मिलेंगे. अगर वो फ्रिज में पानी की बोतले भरकर रखेगा तो उसे पैसे मिलेंगे या फिर घर के बाहर से कोई सामान लाकर देगा तो उसे पैसे मिलेंगे. इससे बचपन में ही उस समझ आएगा कि पैसे कमाने के लिए काम करना पड़ता है, इससे पैसों को बच्चों को नजरिया बदलेगा. 

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