DNA ANALYSIS: अमेरिकी रक्षा मंत्री ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को क्‍यों चुना? जानिए 3 बड़ी वजहें


नई दिल्‍ली:  अमेरिका के रक्षा मंत्री तीन दिन के दौरे पर भारत पहुंच गए हैं और ये बात बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण बात है क्योंकि, अमेरिका में जो बाइडेन की सरकार बनने के बाद उनके रक्षा मंत्री लॉयड जे. ऑस्टिन का ये पहला विदेश दौरा है, जिसके तहत वो जापान और दक्षिण कोरिया के बाद 19 मार्च को भारत पहुंचे और उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात हुई. अमेरिका के रक्षा मंत्री का ये दौरा काफी अहम है.

अमेरिका की भारत विरोधी चिट्ठी  

हालांकि इस महत्वपूर्ण दौरे से ज़्यादा आज एक चिट्ठी की काफ़ी चर्चा हो रही है. ये चिट्ठी अमेरिका के एक सीनेटर यानी सांसद रॉबर्ट मेनेंडेज ने लिखी है, जो वहां सीनेट की फॉरेन रिलेशंस कमेटी के अध्यक्ष भी हैं. इस चिट्ठी में उन्होंने अपने रक्षा मंत्री से कहा है कि भारत में लोकतंत्र कमज़ोर हो रहा है. यहां मानव अधिकारों की स्थिति चिंताजनक है और भारत अपनी अंतरराष्‍ट्रीय जिम्मेदारियों को भूल गया है.

अब हमें ये डर है कि आने वाले दिनों में हमारे ही देश के कुछ नेता इस चिट्ठी को बड़ा मुद्दा बना लेंगे और ये साबित करेंगे कि भारत में लोकतंत्र समाप्त हो गया है और नागरिकों के मौलिक अधिकार भी उनसे छीन लिए गए हैं. इसलिए ऐसा कुछ भी हो उससे पहले ही हम इस चिट्ठी का पूरा चिट्ठा देश के सामने रखना चाहते हैं.

सबसे पहले आपको इस चिट्ठी के बारे में बताते हैं, जो रॉबर्ट मेनेंडेज ने लिखी है, जो अमेरिका के न्‍यू जर्सी से डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद हैं और इसी पार्टी की सरकार अमेरिका में अभी सत्ता में है. अमेरिका के इस सांसद ने भारत दौरे पर अपने रक्षा मंत्री से इस चिट्ठी में आग्रह किया है कि वो भारत में कमज़ोर होते लोकतंत्र और मानव अधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा उठाएं और भारत को उसकी अंतरराष्‍ट्रीय जिम्मेदारियां भी याद दिलाएं. 

इसमें लिखा है कि भारत सरकार कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ चल रहे शांतिपूर्ण किसान आंदोलन को दबा रही है और इसके नाम पर किसानों का दमन कर रही है. इसी में भारत के उन दो क़ानूनों की भी आलोचना की गई है, जो संसद से पास हुए हैं. यानी इस चिट्ठी में हमारे देश की संवैधानिक प्रक्रिया पर ही प्रश्न चिन्ह लगाते हुए ये लिखा गया है कि भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला लिया गया और ये फैसला हमारे देश के मुसलमानों की भावना के विरुद्ध है. 

फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट के आधार पर लगाए गए आरोप 

यहां महत्वपूर्ण बात ये है कि इस चिट्ठी में भारत पर जो आरोप लगाए गए हैं, उसका आधार फ्रीडम हाउस की हाल ही में आई एक रिपोर्ट है, जिसमें कहा गया था कि भारत में आज़ादी काफ़ी सीमित हो चुकी है. हालांकि आपको याद होगा पिछले दिनों हमने अमेरिका के इस एनजीओ की पूरी सच्चाई आपको बताई थी कि इस एनजीओ को अमेरिका की सरकार से 80 प्रतिशत फंडिंग मिलती है. एनजीओ की रेटिंग्‍स अमेरिका की विदेश नीति से पूरी तरह प्रभावित है. 

यानी इस तरह की चिट्ठी लिखने का एक ही मक़सद हो सकता है और वो ये कि लोकतंत्र और मानव अधिकारों का मुद्दा उठा कर बातचीत की टेबल पर अमेरिका के सामने भारत की स्थिति को कमज़ोर करना, जैसा पहले भी किया जाता रहा है. आपको याद होगा पिछले वर्ष फरवरी महीने में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप भारत के दौरे पर आए थे और तब इस दौरे से लगभग एक महीने पहले भी इसी तरह की एक चिट्ठी लिखी गई थी. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि यह चिट्ठी किसी और ने नहीं, बल्कि रॉबर्ट मेनेंडेज नाम के इसी अमेरिकी सांसद ने लिखी थी और इसमें वही सब बातें लिखी हैं, जो इस बार की चिट्ठी में भी हैं.

अब आप खुद सोचिए कि अमेरिका के रक्षा मंत्री भारत के दौरे पर आते हैं और इस दौरे से दो दिन पहले 17 मार्च को वहीं की सीनेट फॉरेन रिलेशंस कमेटी के अध्यक्ष इस तरह की चिट्ठी लिखते हैं, जिसमें भारत के लोकतंत्र को बदनाम करने की कोशिश की गई है.

सांसद रॉबर्ट मेनेंडेज का रिकॉर्ड 

हालांकि आज यहां ये समझना भी ज़रूरी है कि भारत के ख़िलाफ़ ये प्रोपेगेंडा चलाने वाले अमेरिका के सांसद रॉबर्ट मेनेंडेज का रिकॉर्ड क्या कहता है. असल में रॉबर्ट मेनेडेंज 2006 से अमेरिका के न्‍यू जर्सी से वहां की संसद के सदस्य हैं और उन पर अमेरिका की अदालतों में 5 वर्षों तक भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में कार्यवाही भी पूरी हो चुकी है. आरोप है कि उन्होंने एक व्यक्ति को बड़े कॉन्‍ट्रैक्‍ट दिलाने के लिए उनसे महंगे-महंगे गिफ्ट्स लिए और कई बार उनके प्राइवेट जेट्स का भी इस्तेमाल किया.

यही नहीं, 2015 में जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे और ईरान के साथ परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर एक शांतिपूर्ण समझौता हुआ था. तब अमेरिका के इस सांसद का कहना था कि ऐसा करने से ईरान के लिए परमाणु हथियार बनाना आसान हो जाएगा, लेकिन जब इसी समझौते को लेकर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने कड़ा रुख अपनाया और अमेरिका को इससे अलग कर लिया, तो इसका रुख बदल गया.

बाइडेन प्रशासन ने किया था कृषि कानूनों का समर्थन 

इस डबल स्‍टैंडर्ड को आप एक और उदाहरण से समझ सकते हैं. एक तरफ तो इस चिट्ठी में भारत में चल रहे किसान आंदोलन का मुद्दा उठाया गया और ये कहा गया है कि भारत में इस आंदोलन को लेकर सरकार की नीति सही नहीं है, जबकि आज से लगभग एक महीने पहले ही 4 फरवरी को बाइडेन प्रशासन ने भारत के नए कृषि कानूनों का समर्थन करते हुए इसे बाजार के लिए काफी फायदेमंद बताया था. इन डबल स्‍टैंडर्ड्स से आप समझ सकते हैं कि इस चिट्ठी की कोई गंभीरता नहीं है और न ही इसका कोई महत्व है.

हालांकि आज यहां हम आपको एक अहम बात और बताना चाहते हैं और वो ये कि अमेरिका में जो बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद वहां के नए रक्षा मंत्री पहली बार तीनों देशों की विदेश यात्रा पर हैं. वो 16 मार्च को जापान में थे. इसके बाद 17 मार्च को उन्होंने दक्षिण कोरिया का दौरा किया और 19 मार्च को वो भारत के तीन दिन के दौरे पर पहुंचे हैं. जहां वो भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभल से मुलाकात करेंगे.

अमेरिकी रक्षा मंत्री ने विदेश यात्रा के लिए भारत को क्‍यों चुना?

हालांकि समझने वाली बात ये है कि जापान और दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिका का आपसी सुरक्षा समझौता है. यानी अगर जापान या फिर दक्षिण कोरिया पर कोई देश हमला करता है, तो ये हमला अमेरिका पर भी माना जाएगा. हालांकि भारत के साथ अमेरिका का ऐसा कोई समझौता नहीं है, इसके बावजूद अमेरिका के रक्षा मंत्री ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना.

ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि, भारत 30 देशों के NATO समूह का भी हिस्सा नहीं है. ये वो देश हैं, जो एक दूसरे की सुरक्षा और सम्‍प्रभुता को लेकर प्रतिबद्ध हैं,  लेकिन इन सबके बावजूद अमेरिका के रक्षा मंत्री पहले भारत के दौरे पर आए हैं और इसे अमेरिका की बदलती विदेश नीति का भी एक बड़ा उदाहरण माना जा सकता है. इसकी तीन बड़ी वजहें हैं.

पहली वजह ये कि इस समय अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन चीन है और भारत इस दृष्टिकोण से अमेरिका के लिए एक बड़ा पार्टनर बन सकता है. यानी आप कह सकते हैं कि अमेरिका को ये बात समझ आ गई है कि अगर वो चीन के बढ़ते प्रभाव को सीमित करना चाहता है, तो इसके लिए भारत की भूमिका अहम होगी. सबसे बड़ी बात ये कि इससे पहले 13 मार्च को ही क्‍वाड देशों यानी अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान की वर्चुअल बैठक हुई थी और इस बैठक का प्रस्ताव भी अमेरिका ने ही रखा था.

दूसरी वजह ये कि भारत इस समय दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयात करने वाला देश है और अमेरिका भारत के रक्षा क्षेत्र में अपने लिए नई संभावनाएं तलाश रहा है और वो ऐसा करके इस क्षेत्र में रूस के प्रभाव को भी कम करना चाहता है और यही वजह है कि उसने भारत और रूस के बीच हुए S-400 मिसाइल सिस्‍टम डील पर भी नाराज़गी जताई है, जिसका जिक्र इस चिट्ठी में भी है.

आखिरी बात ये कि कोविड के बाद जिस तरह से दुनिया में महाशक्ति का केन्द्र बदला है. उसके बाद अमेरिका ये बात समझ चुका है कि उसे एशिया पैसिफिक रीजन और अफगानिस्तान में अपनी मजबूत पकड़ के लिए भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश की मदद की जरूरत

भारत के लोकतंत्र पर सवाल क्‍यों 

अमेरिका ख़ुद को लोकतंत्र का चैम्पियन मानता है और अक्सर अमेरिका से ऑपरेट होने वाली बड़ी-बड़ी संस्थाएं और वहां के सांसद भारत के लोकतंत्र पर सवाल उठाते हैं,  लेकिन आज हम अमेरिका से कहना चाहते हैं कि उसे भारत के लोकतंत्र पर सवाल उठाने से पहले अपने गिरेबान में भी झांक कर देखना चाहिए.

कैपिटल हिल हिंसा 

इसी वर्ष 6 जनवरी को अमेरिकी की संसद कैपिटल हिल में जबरदस्त हिंसा हुई थी, जिसमें 6 लोग मारे गए थे, लेकिन इसके एक महीने बाद जब देश की राजधानी दिल्ली में किसानों की ट्रैक्टर परेड के दौरान हिंसा हुई और लाल किले पर कुछ लोगों ने क़ब्ज़ा कर लिया तो हमारी पुलिस ने एक भी प्रदर्शनकारी पर हाथ नहीं उठाया, लेकिन इसके बावजूद अमेरिका भारत को लोकतंत्र पर लेक्चर देता है. 

अमेरिका में गन कल्चर की वजह से पिछले साल हुई हिंसाओं में 19 हज़ार लोग मारे गए थे. यही नहीं वहां राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अश्वेत लोगों के ख़िलाफ़ काफी हिंसा हुई थी, लेकिन इसके बावजूद अमेरिका की बड़ी-बड़ी संस्थाएं और वहां के कुछ सांसद भारत की लोकतांत्रिक छवि पर सवाल उठाते हैं और उन्हें अपना घर पूरी तरह सही लगता है.

खालिस्तानी संगठन ने अमेरिका की लॉबिंग फर्म को हायर किया 

अब आपको अमेरिका से ही एक और बड़ी ख़बर के बारे में बताते हैं, जो खालिस्तानी संगठन Sikhs for Justice से जुड़ी है. इस संगठन ने अमेरिका की एक लॉबिंग फर्म, जिसका नाम ब्‍लू स्‍टार स्‍ट्रैटीज है, उसे हायर किया है. इस कंपनी के सीईओ का कहना है कि वो भारत में सिखों के साथ हो रहे खराब बर्ताव को दुनिया में उजागर करेंगे. ये लॉबिंग फर्म अमेरिका की बाइडेन सरकार से पंजाब को भारत से अलग करने की मांग करेगी, लेकिन आपको पता है कि ये सब काम करने के लिए ये लॉबिंग फर्म कितने पैसे लेगी.

इसे आप एक उदाहरण से समझिए. बांग्लादेश की एक पार्टी ने चुनाव के लिए 2019 में इसी लॉ को हायर किया था और उसे इसके बदले हर महीने लगभग 27 लाख रुपये दिए थे. हालांकि इस तरह की सेवाओं के लिए अमेरिका में कई संस्थाएं 40 लाख रुपये तक भी देती हैं और सालाना फीस 5 करोड़ रुपये तक हो सकती है. किसान आंदोलन के नाम पर खालिस्तानी संगठन कैसे पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं और भारत को बदनाम करने का ठेका लॉबिंग फर्म को दिया जा रहा है.



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