Analysis: 2014 से 2021 के बीच ऐसा क्या बदला, ममता पाठ करने लगी और राहुल मत्था टेकने लगे


लखनऊ: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में जनसभा को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने ममता सरकार पर जमकर निशाना साधा. पूरे संबोधन के दौरान एक ऐसी बात सामने आई, जो तुरंत सुर्खियां बनने लगी. योगी ने कहा कि ममता दीदी जय श्री राम के नारे से चिढ़ती हैं. 2014 से पहले लोग मंदिर में जाने से डरते थे लेकिन अब ममता दीदी भी मंदिर में जाकर चंडी पाठ कर रही हैं. वहीं, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी भी मंदिर में माथा टेक रहे हैं. इस बयान के पीछे से अब बड़ा सवाल ये है कि 2014 से लेकर 2021 के बीच ऐसा क्या बदल गया? जिसकी ओर योगी इशारा कर रहे हैं. आइए समझते हैं…

हिंद वोट सत्ता की चाभी- साल 2014 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ बनी. इस चुनाव में सबसे खास बात ये उभरकर सामने आई कि भाजपा को सिर्फ 31 फीसदी वोट मिले. यह किसी भी पार्टी को बहुमत हासिल करने के लिए मिलने वाला सबसे कम वोट है. वहीं, ये भी देखने की बात है कि 66.36 फीसदी लोगों ने ही अपने मत का इस्तेमाल किया था, इसमें भी भाजपा को सरकार बनाने के लिए 31 फीसदी वोट की जरूरत पड़ी. राजनीतिक पंडित बताते हैं कि चुनाव में हिंदू वोटों में एकजुटता देखने को मिली, जो शायद राम मंदिर आंदोलन के समय में भी देखने को नहीं मिली थी. यही वो वोट है, जिसे हासिल करने के लिए देश के सारे नेता मेहनत कर रहे हैं. 

फेल हुआ MY कॉम्बिनेशन- उत्तर भारत की राजनीति में समाजवादी आंदोलन का बड़ा असर रहा है. जेपी के आंदोलन के बाद लालू प्रसाद यादव से लेकर मुलायम सिंह यादव जैसे नेता सामने आए. उन्होंने नया सोशल समीकरण बनाया, जिसमें मुस्लिम के साथ यादवों को एकजुट किया गया, जिसे MY कॉम्बिनेशन कहा गया. हालांकि, 2014 के बाद से ये कॉम्बिनेशन फेल हो गया. साल 2014 की लोकसभा में सपा को सिर्फ 5 सीटें मिलीं. वहीं, लालू की पार्टी आरजेडी को सिर्फ 4 सीटें मिलीं. साल 2019 के चुनाव में एक बार फिर ये प्रयोग दोनों पार्टियों के द्वारा किया गया. लेकिन जहां आरजेडी का खाता नहीं खुला, तो सपा को एक बार फिर 5 सीटें ही हासिल हुईं. राजनीतिक पंडित इसके पीछे का कारण भी हिंदू वोटों की एकजुटता को बताते हैं.

दलित का मतलब जाटव नहीं, ओबीसी का मतलब यादव नहीं- साल 2019 के चुनाव में एकजुट हिंदू वोट को जातिगत पहचान के आधार पर तोड़ने के लिए उत्तर प्रदेश में एक बड़ा प्रयोग देखने को मिला. धुर विरोधी रहे बहुजन समाजवादी पार्टी और समाजवादी पार्टी एक साथ मिलकर चुनाव लड़े. साल 2014 के चुनाव में सपा को 22 फीसदी और बसपा को 19 फीसदी वोट मिले थे. ऐसे में उम्मीद जताई जा रही थी कि वे दोनों मिलकर भाजपा को रोक देंगे. लेकिन दोनों मिलकर 80 में से सिर्फ 15 सीटें ही हासिल कर सके. दोनों के वोट प्रतिशत में 1 फीसदी का गिरावट भी देखने को मिला. राजनीतिक पंडित बताते हैं कि दरअसल, भाजपा ने हिंदुत्व के अंदर अन्य पिछड़ी और दलित जातियों को नेत्तृव दिया, जिन्हें सपा और बसपा नहीं दे सके. पूर्वांचल में कुर्मी वोट को साधने के लिए भाजपा ने अनुप्रिया से गठबंधन किया. केशव प्रसाद मौर्य और अनिल राजभर जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया. ध्यान देने की बात है कि लोकसभा की 120 सीटें बिहार और उत्तर प्रदेश से आती हैं. जहां राम मंदिर का मुद्दा हमेशा प्रमुख रहा है. 

और विपक्ष बदलता गया
एक समय था, जब बसपा में नसीमुद्दीन सिद्दीकी को नंबर दो के नेता माने जाते थे. मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में लाने के लिए मायवाती, मुलायम सिंह और सोनिया गांधी सरीखे नेता हर चुनाव से पहले मौलाना इमाम बुखारी से मुलाकात करते थे. उन्होंने भी अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग पार्टियों को समर्थन दिया. लेकिन 2014 के बाद से विपक्ष की राजनीति में बदलाव देखने को मिला. इसकी शुरुआत 2019 चुनाव से पहले हुई, जब राहुल गांधी को जनेऊधारी पंडित बताया गया. उनकी गोत्र का जिक्र किया गया. इसके बाद राहुल के अलावा उनकी बहन प्रियंका अब जब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को संभालने पहुंची, तो उनकी भी संगम में डुबकी लगाती तस्वीर सामने आ गई. वहीं, हाल ही में अखिलेश यादव मिर्जापुर के विध्यांचल धाम पहुंचे, लेकिन वे मिर्जापुर में मौजूद फेमस कंतित दरगाह शरीफ नहीं गए. जबकि वहां लोग उनका इंतजार कर रहे थे. 

शायद योगी आदित्यनाथ इसी बदलाव का जिक्र कर रहे थे…

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