DNA ANALYSIS: RSS के स्‍कूलों की ये खास बातें दिखाती हैं Rahul Gandhi का अधूरा ज्ञान, पढ़ें Ground Report


नई दिल्‍ली: आज मैं आपसे कुछ सवाल पूछना चाहता हूं. आप अपने जन्मदिन पर केक क्यों काटते हैं? केक पर मोमबत्तियां क्यों लगाते हैं? ये आपको किसने बताया कि बर्थडे पर केक काटने की परंपरा है. जन्मदिन पर मोमबत्तियां बुझाने की व्यवस्था है. ये जरूर आपको कॉन्‍वेंट स्‍कूलों ने या मिशनरी स्‍कूलों ने सिखाया होगा. अब मेरा दूसरा सवाल ये है कि भारत में क्रिसमस, दीवाली जितना बड़ा त्यौहार कैसे है ? ये परंपरा भी मिशनरी स्कूलों से शुरू हुई और फैली. लेकिन किसी ने इस पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया.

सभी स्‍कूलों में एक जैसी किताबें पढ़ाई जाती हैं…

अब अगर मैं आपसे पूछूं कि एक ऐसा स्कूल जो आपको राष्ट्रभक्ति सिखाता हो, एक ऐसा स्कूल जहां की प्राथमिकता में सबसे ऊपर भारतीय संस्कार हों, जिसके कैम्‍पस में भारत माता की तस्वीर और अखंड भारत का नक्शा होना जरूरी हो, जहां की प्रार्थना में शिक्षा की देवी सरस्वती की वंदना अनिवार्य हो. अगर आपको ऐसे स्कूल को रेटिंग देनी हो तो आप क्या रेटिंग देंगे? हमें लगता है कि आप अपने बच्चों को वहां जरूर पढ़ाना चाहेंगे. लेकिन जैसे ही आपको ये बताया जाता है कि ऐसे स्कूल हैं और ये स्कूल RSS यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चलाता है, तो ये सुनकर कुछ लोगों को दिक्कत हो जाती है. जबकि सच्चाई ये है कि स्कूल भले ही भारतीय संस्कार से चलते हैं पर वहां भी वही किताबें पढ़ाई जाती हैं जो देश के किसी भी ऐसे स्कूल के पाठ्यक्रम में होती हैं. ऐसे स्‍कूल जो Central Board of Secondary Education यानी CBSE और राज्यों के बोर्ड पाठ्यक्रम से चल रहे हैं, सभी में एक ही किताब पढ़ाई जाती है. 

स्‍टूडेंट्स ने राहुल गांधी को खारिज किया

हालांकि  इन बच्चों को देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने खारिज कर दिया है. राहुल गांधी ने RSS के स्कूलों में हो रही पढ़ाई को Radicalisation यानी कट्टरता की शिक्षा बताया है. राहुल गांधी ने पाकिस्तान में चल रहे मदरसों में दी जा रही इस्लामिक कट्टरता से इन स्कूलों की तुलना की है. इसलिए इन स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों ने राहुल गांधी के लिए कुछ संदेश भेजे हैं.  इन बच्‍चों ने कहा है कि राहुल गांधी का ज्ञान अधूरा है और उन्‍होंने इन स्‍कूलों को देखे-समझे बिना ही ऐसी बात कह दी. 

भारत में स्वतंत्रता के बाद शिक्षा के लिए मोटे तौर पर दो विकल्प थे. भारत में या तो कॉन्‍वेंट थे या सरकारी स्कूल. एक जगह फीस ज्यादा थी और अंग्रेजी शिक्षा मिलती थी, जबकि दूसरी जगह शिक्षा मुफ्त थी लेकिन उसका स्तर उतना अच्छा नहीं था. इसलिए महंगी एजुकेशन हासिल करने की क्षमता रखने वाले लोग कॉन्‍वेंट स्‍कूलों में पढ़े और गरीब वर्ग ने सरकारी स्कूल चुने. राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने इस जरूरत को पहचान लिया और वो शिक्षा का वो मॉडल लेकर आई जो सीमित संसाधनों वाले व्यक्ति को भारतीय संस्कारों और नैतिक मूल्यों वाली शिक्षा दे सके. 

आरएसएस के स्‍कूलों का इतिहास 

RSS ने 1952 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में पहला स्कूल खोला. 1977 में विद्या भारती की स्थापना की गई. ये आरएसएस का एजुकेशन विंग है. धीरे धीरे हर राज्य और शहर में स्कूल खोले गए. आज विद्या भारती के तहत भारत में 12 हज़ार 850 स्कूल चल रहे हैं. 49 कॉलेज और एकल विद्यालय मिलाकर कुल 30 हज़ार शिक्षण संस्थान काम कर रहे हैं. इन स्कूलों में 80 हज़ार ईसाई और मुस्लिम बच्चे भी पढ़ रहे हैं. 1952 से अब तक विद्या भारती के स्कूलों में 1 करोड़ से ज्यादा बच्चे पढ़ चुके हैं.

राहुल गांधी को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से दिक्कत नहीं?

अब आप बड़ी तस्वीर पर गौर कीजिए. ये बच्चे अब बड़े हो चुके हैं. नीति निर्धारक बन रहे हैं. इस स्तर पर पहुंच चुके हैं कि अपने लिए अपने परिवार के लिए और अहम पदों पर रहते हुए देश के लिए फैसले ले सकें. इसीलिए आप देख रहे हैं कि अब भारत में राष्ट्रवाद की बात हो रही है. अपने देश के मूल्यों को आगे बढ़ाने की बात हो रही है. मातृभाषा में पढ़ाई करने की नीतियां बनाई जा रही हैं. ये सब अचानक नहीं हुआ है, बल्कि ये एक लंबे इंतजार और प्रयास का फल है. यहां गौर करने वाली बात है कि राहुल गांधी को अपनी राजनीति में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से दिक्कत नहीं है, जबकि उसके संस्थापकों ने देश की आजादी की जगह मुसलमानों को पढ़ने के लिए समझाया ताकि वो हिन्दुओं से पिछड़ न जाएं, यही वो सोच थी जिसने आगे पाकिस्तान को जन्म दिया. राहुल गांधी को पश्चिम बंगाल चुनाव में फुरफुरा शरीफ के अब्बास सिद्दीकी से परेशानी नहीं है, जबकि वो खुलेआम मुस्लिमों की राजनीति करते हैं. राहुल गांधी को असम में आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के बदरूद्दीन अजमल से दिक्कत नहीं है, पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्कूलों से बहुत परेशानी है. 

ऐसे हैं विद्या भारती स्‍कूल

हमने देश को राहुल गांधी की सोच का सच बताने के लिए एक ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की है. हम दिल्ली के सरस्वती शिशु मंदिर गए. हमने यहां देखा कि बच्चे पढ़ रहे हैं, कहीं फिजिक्‍स का एग्‍जाम चल रहा है, तो कहीं अकाउंट्स की पढ़ाई हो रही है.  अब हम आपको कुछ ऐसी बाते बतातें हैं जो आपको सिर्फ और सिर्फ सेवा भारती के तहत आने वाले स्कूलों में ही देखने को मिलेंगी. अभिभावक संपर्क- जिसे आज आप पीटीएम यानी पेरेंट टीचर मीटिंग के नाम से जानते हैं. ये इन स्कूलों में कुछ अलग तरीके से निभाया जाता है. 

यहां स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचर यानी आचार्य साल में एक या दो बार बच्चों के घरों में जाते हैं.  घर के माहौल से परिचित होते हैं और बच्चे के विकास पर माता पिता से चर्चा करते हैं.

स्वामी विवेकानंद की तस्वीर के बिना स्कूल अधूरा है. भारत माता की तस्वीर, भारत का नक्शा, मां सरस्वती की वंदना के बिना ये स्कूल अधूरा है. लेकिन स्कूल में न राजनीति की बात होती है न किसी धर्म को मानने या न मानने की. स्कूल में क्रिएटिव आर्ट, खेल कूद और अलग अलग प्रतियोगिताओं में मेडल जीतने वाले बच्चे जरूर मिलते हैं और संस्कारी, प्रेरणा देने वाले संदेश भी.

स्कूल में सुबह की प्रार्थना, इंटरवल के दौरान भोजन से पहले प्रार्थना और स्कूल की छुट्टी के वक्त प्रार्थना जरूरी है.  कोरोना काल में भी ये परंपरा चल रही है. स्कूल के बच्चों और अध्यापकों ने राहुल गांधी को देश के किसी भी स्कूल में बिना पूर्व सूचना का आने का निमंत्रण भी दिया है. 

आरएसएस के स्‍कूलों से शिक्षा पाने वाली नामी हस्तियां

अब हम आपको राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में शिक्षा पाने वाले कुछ छात्रों के बारे में बताते हैं. इससे आपको पता चलेगा इन स्कूलों से मदरसे वाले कट्टरपंथी निकलते हैं या देशभक्त. 

जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों से लड़ते हुए शहीद होने वाले भारतीय सेना के जांबाज़ कर्नल बी. संतोष बाबू विद्या भारती के स्कूल में ही पढ़े थे. भारत में फ्रांस से रफाल लड़ाकू विमान लाने वाले पायलट स्कवाड्रन लीडर दीपक चौहान भी सरस्वती विद्या मंदिर के छात्र रहे हैं.  भारत की ओर से क्रिकेट खेल रहे नवदीप सैनी भी विद्या भारती के छात्र हैं. 2018 में (Asian Games) में एथलेटिक्‍स में सिल्‍वर मेडल जीतने वाली सुधा सिंह भी इसी स्कूल में पढ़ी हैं.



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